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मध्यप्रदेश के Rewa जिले के डभौरा क्षेत्र में रहने वाले दीनानाथ कोल और उनकी पत्नी ननकी देवी ने संतान न होने के दर्द को समाज और प्रकृति की सेवा में बदल दिया। दोनों ने अपनी सूनी गोद का दुख पेड़ों की परवरिश में समर्पित कर दिया और वर्षों की मेहनत से बंजर भूमि को हरे-भरे जंगल में तब्दील कर दिया। आज करीब 105 एकड़ क्षेत्र में फैले 10 हजार से अधिक पेड़ उनकी जीवन साधना और पर्यावरण प्रेम की मिसाल बन चुके हैं।
दीनानाथ बताते हैं कि वर्ष 1990 में एक कार्यक्रम से लौटते समय उन्होंने फेंकी गई आम की गुठलियां इकट्ठा कर बंजर जमीन पर बो दी थीं। इसके बाद आम, आंवला, अमरूद, बेर समेत कई फलदार पौधे लगाए। शुरुआती दौर में कई पौधे नष्ट भी हुए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। धीरे-धीरे सूखी और पथरीली जमीन पर हरियाली फैलने लगी। संतान न होने के कारण उन्होंने इन पौधों को ही अपना परिवार मान लिया और दिन-रात उनकी देखभाल में जुटे रहे।
हालांकि इस सफर में उन्हें कई कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ा। पौधों को पानी देने के लिए खुदवाए गए कुएं को अतिक्रमण बताकर भर दिया गया, जिससे बड़ी संख्या में पौधे प्रभावित हुए। बाद में प्रशासन ने नलकूप की मंजूरी दी, लेकिन उसका काम अब तक पूरा नहीं हो सका। इसके बावजूद दंपती का हौसला नहीं टूटा। आज उनका यह जंगल न केवल क्षेत्र को हरियाली और स्वच्छ हवा दे रहा है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का प्रेरणादायक उदाहरण भी बन गया है। पर्यावरणविद् Anil Prakash Joshi का मानना है कि प्रकृति से केवल लेने के बजाय उसमें योगदान देना भी हमारी जिम्मेदारी है, और दीनानाथ-ननकी दंपती इसका जीवंत उदाहरण हैं।
Patrakar Priyanshi Chaturvedi
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