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बैतूल में गोंड समाज की अनोखी होली परंपरा
Unique Holi tradition of Gond community in Betul

बैतूल जिला के आदिवासी क्षेत्रों में गोंड कोयतुर समुदाय की होली अपनी अनूठी परंपराओं और प्रकृति से गहरे जुड़ाव के लिए जानी जाती है। यहां होली केवल एक दिन का त्योहार नहीं बल्कि करीब एक महीने तक चलने वाला सामुदायिक धार्मिक उत्सव होता है, जिसे खंडराय गढ़ जतरा के नाम से भी जाना जाता है। अलग-अलग गांवों में अलग-अलग दिनों पर मेले आयोजित किए जाते हैं, जिनकी तारीख ग्राम सरपंच और समिति तय करती है। इस दौरान दूर-दूर से रिश्तेदार और श्रद्धालु भी शामिल होते हैं।

 

शोधकर्ता Rahul Kumre के अनुसार इस पर्व की शुरुआत खंडराय पेन (मेघनाथ) की विशेष पूजा से होती है। पूजा से एक सप्ताह पहले देव स्थल को गेरू से पोतकर और चूने के गोल ठपकों से सजाया जाता है। इसके बाद समाज की सुख-समृद्धि और रोगों से रक्षा की कामना के साथ विधिविधान से पूजा-अर्चना की जाती है। गोंड समाज की होली पूरी तरह प्राकृतिक रंगों पर आधारित होती है, जिसमें पलाश या टेंशू के फूलों से रंग तैयार किए जाते हैं। यह परंपरा पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति से जुड़ाव का संदेश देती है।

वहीं Narmadapuram के ग्वालटोली क्षेत्र में Gwal community पिछले करीब 50 वर्षों से होली को सामाजिक एकता के प्रतीक के रूप में मना रहा है। समाज के चौधरी Nandu Yadav के अनुसार होली के दिन समाज के लोग एकत्रित होकर फाग गीत गाते हुए ढोलक और मंजीरे की थाप पर उन घरों में जाते हैं, जहां हाल ही में किसी परिवार में शोक हुआ होता है। वहां जाकर हल्का गुलाल लगाकर परिवार को सांत्वना दी जाती है और फवुआ (मीठी बूंदी) बांटी जाती है। इस परंपरा के माध्यम से समाज यह संदेश देता है कि दुख की घड़ी में पूरा समुदाय एक साथ खड़ा है

Priyanshi Chaturvedi 5 March 2026

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